गणेश द्वात्रिंशत् (32 रूपनामानि)

बालश्च तरुणो भक्तो वीरश्शक्तिर् द्विजस्तथा। 1 (6)

सिद्धि-रुच्छिष्ट-विघ्नश्च क्षिप्रो हेरंब एव च।। 2 (5)

लक्ष्मीर् महांश्च विजयो नृत्य-न्नूर्ध्वो गणेश्वरः। 3 (5)

एकाक्षरो वरश्चापि त्र्यक्षरश्च गणेश्वरः। 4 (3)

क्षिप्र प्रसादो हारिद्र एकदंतो गणेश्वरः। 5 (3)

एष वै सृष्टि.रुद्दंड ऋणमोचन एव नः। 6 (3)

ढुंढिर् द्विमुख रूपश्च त्रिमुख.स्सिंह रूपवान्। 7 (4)

योगो दुर्गो गणाधीश-स्संकष्टहर एव नः।। 8 (3)

नामानि द्वात्रिंशतं यो गणेशस्य जपेन्नरः।

ततो वित्तस्य विभवं निर्विघ्नं लभते घनम्।। 9

(चिन्तामणि गणपति क्षेत्रम्- वंशीकृष्ण घनपाठी 31-08-19)

गणपति द्वात्रिंशत् कीर्तनम्

बाल गणपतये - तरुण गणपतये -

भक्त गणपतये वीर गणपतये।

शक्ति गणपतये नमो नमो द्विजगणपे

सिद्धिगणपतये प्रणति रुच्छिष्टा..य।। 1

विघ्नगणपतये क्षिप्र गणपतये

नमो हेरंबाय लक्ष्मीगणपतये

महागणपतये विजय गणपतये

नृत्यगणपतये ऊर्ध्व गणपतये।। 2

एकाक्षर गणपे नमो वर गणपे

त्र्यक्षराय नमो नमः~ क्षिप्र प्रसादाय।

हरिद्रा गणपे एकदंताय ..

सृष्टि गणपतये प्रणति.रुद्दंडा..य 3.

ऋणविमोचन ते नमो ढुंढि गणपतये

द्विमुख गणपतये त्रिमुख गणपतये

सिंह गणपतये योग गणपतये

दुर्ग गणपतये संकट- हरण गणपतये।। 4

विघ्नरोगभयं .. हरते बुद्धिशुद्धिघनं ... ददते

सद्वयं त्रिंशतं धरते सच्चिदानंदात्मने .....