सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि।
विद्यारंभं करिष्यामि सिद्धि र्भवतु मे सदा।। 67
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद
प्रसीद मात र्जगतोखिलस्य।
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं
त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य।। 68
आधारभूता जगत स्त्वमेका
महीस्वरूपेण यत स्स्थितासि।
अपां स्वरूपस्थितया त्वयैत
दाप्यायते कृत्स्नमलंघ्यवीर्ये।। 69
त्वं वैष्णवीशक्ति रनंतवीर्या
विश्वस्य बीजं परमासि माया।
संमोहितं देवि समस्त मेतत्
त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः।। 70
विद्या स्समस्ता स्तव देवि ! भेदा
स्स्त्रिय स्समस्ता स्सकला जगत्सु।
त्वयैकया पूरित मंबयैतत्
का ते स्तुति स्तव्य परा परोक्तिः? 71
सर्वभूता यदा देवि, भुक्तिमुक्ति प्रदायिनि।
त्वं स्तुता स्तुतये का वा, भवंति परमोक्तयः।। 72
सर्वस्य बुद्धिरूपेण, जनस्य हृदि संस्थिते।
स्वर्गापवर्गदे देवि ! नारायणि ! नमो(अ)स्तुते 73
कळा काष्ठादि रूपेण, परिणाम प्रदायिनि।
विश्वस्योपरतौ शक्ते, नारायणि ! नमो(अ)स्तुते।। 74
सर्वमंगळ मांगल्ये! शिवे! सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये! त्र्यंबके! गौरि! नारायणि! नमो(अ)स्तुते।। 75
सृष्टि स्थिति विनाशानां शक्ति भूते सनातनि।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमो(अ)स्तुते।। 76
शरणागत दीनार्त, परित्राण परायणे।
सर्वस्यार्तिहरे ! देवि ! नारायणि ! नमोस्तुते 77 हंसयुक्त विमानस्थे; ब्रह्माणी रूपधारिणि।
कौशांभः क्षरिके ! देवि ! नारायणि! नमोस्तुते।। 78 त्रिशूल चंद्राहिधरे ! महावृषभ वाहिनि।
माहेश्वरी स्वरूपेण, नारायणि ! नमोस्तुते।। 79
मयूर कुक्कुट वृते! महाशक्तिधरे(अ)नघे।
कौमारी रूप संस्थाने ! नारायणि ! नमोस्तुते।। 80
शंख चक्र गदा शार्ङ्ग - गृहीत परमायुधे।
प्रसीद वैष्णवीरूपे ! नारायणि ! नमो(अ)स्तुते।। 81 गृहीतोग्र महाचक्रे ! दंष्ट्रोद्धृत वसुंधरे।
वाराहरूपिणि ! शिवे ! नारायणि ! नमो(अ)स्तुते।। 82 नृसिंहरूपेणोग्रेण, हंतुं दैत्यान् कृतोद्यमे।
त्रैलोक्य त्राण सहिते ! नारायणि ! नमो(अ)स्तुते।। 83
किरीटिनि ! महावज्रे ! सहस्र नयनोज्ज्वले।
वृत्र प्राणहरे ! चैंद्रि ! नारायणि ! नमो(अ)स्तुते।। 84 शिवदूती स्वरूपेण, हतदैत्य महाबले।
घोररूपे ! महारावे ! नारायणि ! नमो(अ)स्तुते।। 85
दंष्ट्रा कराळवदने ! शिरोमाला विभूषणे।
चामुंडे! मुंडमथने! नारायणि ! नमो(अ)स्तुते।। 86
लक्ष्मि लज्जे महाविद्ये श्रद्धे पुष्टि स्वधे ध्रुवे।
महारात्रि महामाये नारायणि नमो(अ)स्तुते।। 87
मेधे सरस्वति वरे भूति बाभ्रवि तामसि।
नियते त्वं प्रसीदेशे नारायणि नमो(अ)स्तुते।। 88
सर्वस्वरूपे ! सर्वेशे ! सर्वशक्ति समन्विते।
भयेभ्य स्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोस्तुते।। 89
एतत्ते वदनं सौम्यं, लोचनत्रय भूषितम्।
पातु न स्सर्वभूतेभ्यः कात्यायनि नमोस्तुते।। 90
ज्वाला कराळ मत्युग्र, मशेषासुर सूदनम्।
त्रिशूलं पातु नो भीते र्भद्रकाळि नमोस्तुते।। 91
हिनस्ति दैत्य तेजांसि, स्वनेनापूर्य या जगत्।
सा घंटा पातु नो देवि ! पापेभ्यो न स्सुतानिव।। 92
असुरासृ ग्वसापंक, चर्चितस्ते करोज्ज्वलः।
शुभाय खड्गो भवतु, चंडिके त्वां नता वयम्।। 93
रोगा नशेषा नपहंसि तुष्टा
रुष्टातु कामान् त्सकला नभीष्टान्।
त्वा माश्रितानां न विप न्नराणां
त्वा माश्रिता ह्याश्रयतां प्रयांति।। 94
चतुर्भुजे चंद्रकळावतंसे कुचोन्नते कुंकुम रागशोणे।
पुंड्रेक्षु पाशांकुश पुष्पबाण- हस्ते नमस्ते जगदेकमातः।। 95